Tuesday, September 29, 2009
अन्तर
अजब सा अन्तर है
पीढी दर पीढी के लोगों में
कोई कहता है कि
ज़माना बदल गया है
आरोपी तो मनुष्य है
क्योंकि
उसने ज़माने को बदल दिया।
कल तक माँ का दूध पीकर
बच्चों कि हड्डियां फौलाद बनती थी
लेकिन आज....
शराब पीकर माँ के दूध को
हड्डियों को पिघलाया जाता है
अजब तो तब लगता है
जब
मिट्टी कि सौंधी खुशबू
गाँव के अनजान, अंधेर भरे
टेढ़े- मेढ़े गलियारों से होकर
नुक्कड़ के पीछे की
वो पुरानी झोपडी देखता हूँ,
पता चलता है की
आज-कल
उस झोपडी का वजूद
विदेश कि किसी बड़ी
अट्टालिका में पल रहा है....
पीढी दर पीढी के लोगों में
कोई कहता है कि
ज़माना बदल गया है
आरोपी तो मनुष्य है
क्योंकि
उसने ज़माने को बदल दिया।
कल तक माँ का दूध पीकर
बच्चों कि हड्डियां फौलाद बनती थी
लेकिन आज....
शराब पीकर माँ के दूध को
हड्डियों को पिघलाया जाता है
अजब तो तब लगता है
जब
मिट्टी कि सौंधी खुशबू
गाँव के अनजान, अंधेर भरे
टेढ़े- मेढ़े गलियारों से होकर
नुक्कड़ के पीछे की
वो पुरानी झोपडी देखता हूँ,
पता चलता है की
आज-कल
उस झोपडी का वजूद
विदेश कि किसी बड़ी
अट्टालिका में पल रहा है....
Wednesday, August 5, 2009
इंतज़ार
इंतज़ार...
इंतज़ार...
पता नही कब
बेरंग आंखों में
समाई
इन तस्वीरों में
कम ही सही
पर रंग तो भर जाए
क्योंकि
इसी रंग ने कभी
मेरे जीवन को
बेरंग किया है,
पर जब
बेरंग हो रहा था
सुकून था
किसी की मौजूदगी का
शायद इसलिए
आज भी
उस रंग का मुझे है
इंतज़ार...
इंतज़ार...
इंतज़ार...
इंतज़ार...
पता नही कब
बेरंग आंखों में
समाई
इन तस्वीरों में
कम ही सही
पर रंग तो भर जाए
क्योंकि
इसी रंग ने कभी
मेरे जीवन को
बेरंग किया है,
पर जब
बेरंग हो रहा था
सुकून था
किसी की मौजूदगी का
शायद इसलिए
आज भी
उस रंग का मुझे है
इंतज़ार...
इंतज़ार...
इंतज़ार...
शब्द
अक्सर लिखते-लिखते
मेरी कलम रुक जाती है
सोचता हूँ की मैं
क्यों और क्या लिख रहा हूँ।
फिर अचानक असंख्य शब्द
मेरे मन की गहराई में
गूंजने लगते है, फिर सोचता हूँ की
क्या मैं जीना सीख रहा हूँ।
उधार के शब्दों से अपने जीवन का
क़र्ज़ उतारना चाहता हूँ
पर मजबूर होकर फिर सोचता हूँ की
क्या मैं वो हूँ जो दिख रहा हूँ।
शब्दों से अनंत शंघर्ष के बाद
ख़ुद को वहीँ खड़ा देख, हैरान....
और फिर वही सोचता हूँ की
मैं क्यों और क्या लिख रहा हूँ।
मेरी कलम रुक जाती है
सोचता हूँ की मैं
क्यों और क्या लिख रहा हूँ।
फिर अचानक असंख्य शब्द
मेरे मन की गहराई में
गूंजने लगते है, फिर सोचता हूँ की
क्या मैं जीना सीख रहा हूँ।
उधार के शब्दों से अपने जीवन का
क़र्ज़ उतारना चाहता हूँ
पर मजबूर होकर फिर सोचता हूँ की
क्या मैं वो हूँ जो दिख रहा हूँ।
शब्दों से अनंत शंघर्ष के बाद
ख़ुद को वहीँ खड़ा देख, हैरान....
और फिर वही सोचता हूँ की
मैं क्यों और क्या लिख रहा हूँ।
बारिश
वो जो दीवाना था
मासूम सा दीखता था
अपनी ही दर्द की अमीरी में
सुबह-शाम बिकता था।
आंसू का जाम छलकता
उसकी आंखों के पैमाने से
ख़ुद के अश्क में वो
तन-बदन भीगता था।
लोग कहते है की
उसकी कहानी पूरी हुई
पर हर
नकाबपोश चेहरे में
वो अक्सर मुझे दीखता था।
आज कलम कुछ बयान करे
वो समय भी आ गया था
टपक गए आंसू उसके मेरी आँख से
जब मैं उसके बारे मी लिखता था.
मासूम सा दीखता था
अपनी ही दर्द की अमीरी में
सुबह-शाम बिकता था।
आंसू का जाम छलकता
उसकी आंखों के पैमाने से
ख़ुद के अश्क में वो
तन-बदन भीगता था।
लोग कहते है की
उसकी कहानी पूरी हुई
पर हर
नकाबपोश चेहरे में
वो अक्सर मुझे दीखता था।
आज कलम कुछ बयान करे
वो समय भी आ गया था
टपक गए आंसू उसके मेरी आँख से
जब मैं उसके बारे मी लिखता था.
Saturday, June 6, 2009
नीरज की पाती
आदमी ख़ुद को कभी यूँ भी सज़ा देता है,
रौशनी के लिए शोलों को हवा देता है।
खून के दाग है दामन पे जहाँ सन्तों के,
तू वहाँ कौन से नानक को सदा देता है।
एक ऐसा भी वो तीरथ है मेरी धरती पर,
कातिलों को जहाँ मन्दिर भी दुआ देता है।
मुझको उस वैध्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।
चील- कौओं की अदालत में है मुजरिम कोयल,
देखिये वक्त ये अब फ़ैसला क्या देता है।
तू खड़ा हो के कहाँ मांग रहा है रोटी,
ये सियासत का नगर सिर्फ़ दगा देता है।
मैं किसी बच्चे की मानीन्द सुबक उठता हूँ,
जब कोई माँ की तरह मुझको दुआ देता है।
साँस के बोझ से जब रूह तड़प उठती है,
वो तेरा प्यार है जो दिल को हवा देता है।
मत उसे ढूँढिये शब्दों के नुमायश घर में,
हर पपीहा यहाँ " नीरज " का पता देता है.
रौशनी के लिए शोलों को हवा देता है।
खून के दाग है दामन पे जहाँ सन्तों के,
तू वहाँ कौन से नानक को सदा देता है।
एक ऐसा भी वो तीरथ है मेरी धरती पर,
कातिलों को जहाँ मन्दिर भी दुआ देता है।
मुझको उस वैध्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।
चील- कौओं की अदालत में है मुजरिम कोयल,
देखिये वक्त ये अब फ़ैसला क्या देता है।
तू खड़ा हो के कहाँ मांग रहा है रोटी,
ये सियासत का नगर सिर्फ़ दगा देता है।
मैं किसी बच्चे की मानीन्द सुबक उठता हूँ,
जब कोई माँ की तरह मुझको दुआ देता है।
साँस के बोझ से जब रूह तड़प उठती है,
वो तेरा प्यार है जो दिल को हवा देता है।
मत उसे ढूँढिये शब्दों के नुमायश घर में,
हर पपीहा यहाँ " नीरज " का पता देता है.
Thursday, May 28, 2009
Saturday, May 23, 2009
हमसफ़र
आपकी जिस किसी पे नजर हो गई
जिंदगी उसकी मुनव्वर हो गई है.
मेरी हर राह हर मुकाम हो तुम
और मंजिल तेरा घर हो गई है।
ज़ख्म भरते नही दर्द जाता नही
चोट दिल पे इस कदर हो गई है।
जबसे तुमको मैंने तनहा देखा है
मेरी हालत और बदतर हो गई है।
कह नही सकता यूँ हाल-ऐ-दिल तुमसे
और चर्चा शहर भर हो गई है।
दूर कर ले तू मुझको ख़ुद से साथी
तेरी यादें मेरी हमसफ़र हो गई है..
जिंदगी उसकी मुनव्वर हो गई है.
मेरी हर राह हर मुकाम हो तुम
और मंजिल तेरा घर हो गई है।
ज़ख्म भरते नही दर्द जाता नही
चोट दिल पे इस कदर हो गई है।
जबसे तुमको मैंने तनहा देखा है
मेरी हालत और बदतर हो गई है।
कह नही सकता यूँ हाल-ऐ-दिल तुमसे
और चर्चा शहर भर हो गई है।
दूर कर ले तू मुझको ख़ुद से साथी
तेरी यादें मेरी हमसफ़र हो गई है..
मोहब्बत की इब्तिदा
" जियाउर रहमान जाफरी "
जो पढ़ चुका था वही फ़िर किताब क्या देती
वह मेरे हाथ में ताज़ा गुलाब क्या देती।
अभी तो अपनी मोहब्बत की इब्तिदा ही थी
अभी से ख़त का हमारे जवाब क्या देती।
मैं पूछता ही भला क्यों सबब भुलाने का
वह बेवफा थी वफ़ा का हिसाब क्या देती।
मैं उसी बज्म में तारवीर से ही पहुँचा था
पिला चुकी थी बहुत अब शराब क्या देती।
सहेज कर जिसे रखा था उम्र भर उसने
मज़े किसी को लुटाकर शराब क्या देती।
हमारे दिल को बहरहाल टूट जाना था
जो नींद छीन चुकी थी वह ख्वाब क्या देती।
गिरा ही देती वह बिजली भरी जवानी की
हटा के चेहरे से अपने नकाब क्या देती..
जो पढ़ चुका था वही फ़िर किताब क्या देती
वह मेरे हाथ में ताज़ा गुलाब क्या देती।
अभी तो अपनी मोहब्बत की इब्तिदा ही थी
अभी से ख़त का हमारे जवाब क्या देती।
मैं पूछता ही भला क्यों सबब भुलाने का
वह बेवफा थी वफ़ा का हिसाब क्या देती।
मैं उसी बज्म में तारवीर से ही पहुँचा था
पिला चुकी थी बहुत अब शराब क्या देती।
सहेज कर जिसे रखा था उम्र भर उसने
मज़े किसी को लुटाकर शराब क्या देती।
हमारे दिल को बहरहाल टूट जाना था
जो नींद छीन चुकी थी वह ख्वाब क्या देती।
गिरा ही देती वह बिजली भरी जवानी की
हटा के चेहरे से अपने नकाब क्या देती..
वो जो शायर था चुप सा रहता था
" गुलज़ार "
वो जो शायर था चुप- सा रहता था
बहकी- बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूंगी खामोशियों की आवाजें
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे- रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे- पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिरकर मर गया है वो
लोग कहते है खुदखुशी की है..
वो जो शायर था चुप- सा रहता था
बहकी- बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूंगी खामोशियों की आवाजें
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे- रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे- पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिरकर मर गया है वो
लोग कहते है खुदखुशी की है..
घोंसला
" मूर्तिदेव "
..... मैं चाहता हूँ
कि चिडियां
मुझे भी
यह सब सिखाये .....
कि किस तरह
असीम आकाश में
उड़ने का एहसास
एक घोंसले में
रहकर भी
जीवित रखा जा सकता है..
..... मैं चाहता हूँ
कि चिडियां
मुझे भी
यह सब सिखाये .....
कि किस तरह
असीम आकाश में
उड़ने का एहसास
एक घोंसले में
रहकर भी
जीवित रखा जा सकता है..
कवि
" वेणुगोपाल "
आपकी ग़लत मांग है
कवि से
कि वह खरीदकर
पिए
ज़िन्दगी के बारे में
कुछ कहने से पहले
ज़िन्दगी जिए
वरना चुपचाप रहे
होंठ सिये
आख़िर कवि है वह
और कसूर आपका है
कि आप ही ने बता रखा है उसे
कि वह वहाँ पहुँच सकता है
जहाँ रवि नही पहुँच सकता..
आपकी ग़लत मांग है
कवि से
कि वह खरीदकर
पिए
ज़िन्दगी के बारे में
कुछ कहने से पहले
ज़िन्दगी जिए
वरना चुपचाप रहे
होंठ सिये
आख़िर कवि है वह
और कसूर आपका है
कि आप ही ने बता रखा है उसे
कि वह वहाँ पहुँच सकता है
जहाँ रवि नही पहुँच सकता..
परछाइयां
" अभिषेक पाटनी "
अक्सर
सोचता हूँ
गाँव की गलियों से
शहर के
रास्तों तक के
सफर के बारे में
और
अक्सर
कुछ हाथ नही लगता
सिर्फ़ दिखती है
खामोश रात में
रौशनी से सराबोर
शहर की
किसी सुनसान सड़क पर
ख़ुद से लम्बी ख़ुद की
कई हलकी परछाइयां..
अक्सर
सोचता हूँ
गाँव की गलियों से
शहर के
रास्तों तक के
सफर के बारे में
और
अक्सर
कुछ हाथ नही लगता
सिर्फ़ दिखती है
खामोश रात में
रौशनी से सराबोर
शहर की
किसी सुनसान सड़क पर
ख़ुद से लम्बी ख़ुद की
कई हलकी परछाइयां..
Friday, May 22, 2009
अन्तर
" अखबार से ली हुई कुछ अहम् पंक्तियाँ "
जीव विज्ञानं की परीक्षा थी
वनस्पति और जंतु जगत में
ग्यारह अन्तर लिखने के बाद
उसमे डाली एक पाद- टिप्पणी-
सबसे अहम् अन्तर यह की
पड़ पौधे आत्म हत्या नही करते..
जीव विज्ञानं की परीक्षा थी
वनस्पति और जंतु जगत में
ग्यारह अन्तर लिखने के बाद
उसमे डाली एक पाद- टिप्पणी-
सबसे अहम् अन्तर यह की
पड़ पौधे आत्म हत्या नही करते..
ग़ज़ल ज़रा
तू मुझको देना जिंदगी हर मोड़ पर मरहम ज़रा,
मैं हूँ समझता वक्त के जालिम इशारे कम ज़रा।
हर इम्तिहान उस दौर का अब भी मुझे सब याद है,
मीलों के थे फांसले और धुप के मौसम ज़रा।
आकाश में उड़ते रहे जब परकटी यादों के पर,
क्यों राहतों के दौर में थे दिल में फ़िर मातम ज़रा।
मुकम्मल तेरी बातों में क्यूँ वो दर्द- सा बहता नही,
अब छोड़ बातें चाँद की भर आँख में शबनम ज़रा..
मैं हूँ समझता वक्त के जालिम इशारे कम ज़रा।
हर इम्तिहान उस दौर का अब भी मुझे सब याद है,
मीलों के थे फांसले और धुप के मौसम ज़रा।
आकाश में उड़ते रहे जब परकटी यादों के पर,
क्यों राहतों के दौर में थे दिल में फ़िर मातम ज़रा।
मुकम्मल तेरी बातों में क्यूँ वो दर्द- सा बहता नही,
अब छोड़ बातें चाँद की भर आँख में शबनम ज़रा..
इन दिनों
दिल खौफ उजालों से खाए है इन दिनों,
अपनी ही परछाई डराए है इन दिनों।
है कौन? कहाँ के है? यहाँ आए किसलिए?
दिल ये सवालात उठाये है इन दिनों।
अच्छा हो जो कोई नकाब उनका खेंच ले,
आइना जो जमाने को दिखाए है इन दिनों।
यादों का समंदर और ये अश्कों की चांदनी,
साँसों में कोई तूफ़ान उठाये है इन दिनों।
चलना है बहुत दूर पाँव में छालों के बावजूद,
आवाज़ कोई दूर से बुलाये है इन दिनों..
अपनी ही परछाई डराए है इन दिनों।
है कौन? कहाँ के है? यहाँ आए किसलिए?
दिल ये सवालात उठाये है इन दिनों।
अच्छा हो जो कोई नकाब उनका खेंच ले,
आइना जो जमाने को दिखाए है इन दिनों।
यादों का समंदर और ये अश्कों की चांदनी,
साँसों में कोई तूफ़ान उठाये है इन दिनों।
चलना है बहुत दूर पाँव में छालों के बावजूद,
आवाज़ कोई दूर से बुलाये है इन दिनों..
मौन करुणा
" राम कुमार वर्मा "
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जानता हूँ इस जगत में फूलों की है आयु कितनी
और यौवन से उभरती साँसों में है वायु कितनी,
इसलिए आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जोड़ कर कण- कण कृपण आकाश ने तारे सजाएं
जो की उज्जवल है सही पर क्या किसी के काम आए,
प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गई जैसे दिशाएँ
एक तरनी एक नाविक और कितनी आपदाएं,
संसार में सिर्फ़ मार्ग तुम्हारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ..
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जानता हूँ इस जगत में फूलों की है आयु कितनी
और यौवन से उभरती साँसों में है वायु कितनी,
इसलिए आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
जोड़ कर कण- कण कृपण आकाश ने तारे सजाएं
जो की उज्जवल है सही पर क्या किसी के काम आए,
प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।
यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गई जैसे दिशाएँ
एक तरनी एक नाविक और कितनी आपदाएं,
संसार में सिर्फ़ मार्ग तुम्हारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ..
Wednesday, May 20, 2009
Tuesday, May 19, 2009
और भी
हकीकत का साया यूँ साथ हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला
जमानत पर लिए कुछ दिन चाह की सुधार लूँ
पर हिम्मत न थी की दोबारा फिर उधार लूँ,
फिर वही कगार वही समय हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
अतीत की परत को वर्तमान से ढकना चाहा
अतीत ने फिर वर्तमान में महकना चाहा,
हर कर्म को अश्क धीरे धीरे धो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
वक्त ने फिर एक बार अपना रुख मोडा
सामने देख किस्मत ने भी अपना मुख मोडा,
खोकर जो कुछ पाया उसे फिर खो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
न जाने क्यों परछाई पीछा नही छोड़ती
बुरी किस्मत भी अपना दम क्यों नही तोड़ती,
खुली आंखों से अब पूरी रात मैं सो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
एकबार फिर अतीत को सामने देख
पुराणी यादों के संग हो चला, न जाने क्यों..
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला
जमानत पर लिए कुछ दिन चाह की सुधार लूँ
पर हिम्मत न थी की दोबारा फिर उधार लूँ,
फिर वही कगार वही समय हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
अतीत की परत को वर्तमान से ढकना चाहा
अतीत ने फिर वर्तमान में महकना चाहा,
हर कर्म को अश्क धीरे धीरे धो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
वक्त ने फिर एक बार अपना रुख मोडा
सामने देख किस्मत ने भी अपना मुख मोडा,
खोकर जो कुछ पाया उसे फिर खो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
न जाने क्यों परछाई पीछा नही छोड़ती
बुरी किस्मत भी अपना दम क्यों नही तोड़ती,
खुली आंखों से अब पूरी रात मैं सो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
एकबार फिर अतीत को सामने देख
पुराणी यादों के संग हो चला, न जाने क्यों..
इन्तजार
ज़िन्दगी ने दिखाया वो दिन की
जीवन से नही मौत से प्यार है,
अब तो मरना छोटी बात हो गई
घुट- घुट के जीना भी इकरार है।
ऊपरवाले से हमने फरियाद की
एक दिन सूरज, एक दिन चाँद के लिए माँगा,
सूरज को तो कोई शिकवा न थी हमसे
पर चाँद को आज भी इनकार है।
अब जीना है तो अपनों के लिए
अपने लिए जीने की कोई ख्वाहिश नही,
किनारा सोचा था हमने, जहाँ खड़े थे
पल भर में पता चला वह एक मंज्धार है।
चार दिन थे दिवाली के ज़िन्दगी में
कब आए पता नही कब गए पता नही,
मालूम होता है मेरे पंचांग में
पूरा जीवन रोजे का त्यौहार है।
हम भूल गए थे की चाँद साथ नही है
इसलिए शायद पलक पूरी रात खुली रहती है,
ढूंढते है हम अपने चाँद को आकाश में
फिर भूल गए हम की आज अमावस्या का वार है।
शायद इसलिए आज भी पलक खुलने पर
चौदहवीं के चाँद का इन्तजार है..
जीवन से नही मौत से प्यार है,
अब तो मरना छोटी बात हो गई
घुट- घुट के जीना भी इकरार है।
ऊपरवाले से हमने फरियाद की
एक दिन सूरज, एक दिन चाँद के लिए माँगा,
सूरज को तो कोई शिकवा न थी हमसे
पर चाँद को आज भी इनकार है।
अब जीना है तो अपनों के लिए
अपने लिए जीने की कोई ख्वाहिश नही,
किनारा सोचा था हमने, जहाँ खड़े थे
पल भर में पता चला वह एक मंज्धार है।
चार दिन थे दिवाली के ज़िन्दगी में
कब आए पता नही कब गए पता नही,
मालूम होता है मेरे पंचांग में
पूरा जीवन रोजे का त्यौहार है।
हम भूल गए थे की चाँद साथ नही है
इसलिए शायद पलक पूरी रात खुली रहती है,
ढूंढते है हम अपने चाँद को आकाश में
फिर भूल गए हम की आज अमावस्या का वार है।
शायद इसलिए आज भी पलक खुलने पर
चौदहवीं के चाँद का इन्तजार है..
दीदार
कौन कहता है
दीकार नही होता,
आदमी ख़ुद ही
तलबगार नही होता।
तुम उसे प्यार करो
वो न तुम्हे प्यार करे,
बेखबर इतना कभी
करतार नही होता।
तुम पुकारो तो सही
दिल से उस दिलबर को,
देखना कैसे वो
साकार नही होता।
तू जब अपनी खुदी को
ख़ुद ही नही मिटाता है,
फिर तो भगवान् का
दीदार कैसे होता है..
दीकार नही होता,
आदमी ख़ुद ही
तलबगार नही होता।
तुम उसे प्यार करो
वो न तुम्हे प्यार करे,
बेखबर इतना कभी
करतार नही होता।
तुम पुकारो तो सही
दिल से उस दिलबर को,
देखना कैसे वो
साकार नही होता।
तू जब अपनी खुदी को
ख़ुद ही नही मिटाता है,
फिर तो भगवान् का
दीदार कैसे होता है..
गुजरे पल
कुछ पलछिन और पुरानी यादों को समेट
आज मैं एक कविता लिख रहा हूँ,
एक बड़े और खुशहाल जीवन को छोड़
बीती यादो के सहारे जी रहा हूँ।
क्या नही, उनको, उनकी गलियाँ, शहर
सब कुछ छोड़ आया वहाँ, यहाँ अकेला,
रहता हूँ गुमनाम गुमसुम सा
दिखाता हूँ की अमृत पी रहा हूँ।
उनका क्या करूँ जो अविश्वसनीय
तेजी से मेरे अन्दर दफ़न हो गई,
यादों को मिटाना असंभव सा लगता
अपनी आंखों में तस्वीर लिए फिरता हूँ।
कभी न भूल पाऊंगा उनकी खुशबू
उनकी साँसे, उनकी थिरकन, उनकी आवाज,
बस अब यही तो जीने का सहारा है
मरकर भी रोज जिंदगी जी रहा हूँ..
आज मैं एक कविता लिख रहा हूँ,
एक बड़े और खुशहाल जीवन को छोड़
बीती यादो के सहारे जी रहा हूँ।
क्या नही, उनको, उनकी गलियाँ, शहर
सब कुछ छोड़ आया वहाँ, यहाँ अकेला,
रहता हूँ गुमनाम गुमसुम सा
दिखाता हूँ की अमृत पी रहा हूँ।
उनका क्या करूँ जो अविश्वसनीय
तेजी से मेरे अन्दर दफ़न हो गई,
यादों को मिटाना असंभव सा लगता
अपनी आंखों में तस्वीर लिए फिरता हूँ।
कभी न भूल पाऊंगा उनकी खुशबू
उनकी साँसे, उनकी थिरकन, उनकी आवाज,
बस अब यही तो जीने का सहारा है
मरकर भी रोज जिंदगी जी रहा हूँ..
परछाई
क्या क्या कहूँ उनके बारे में
वो ज्योत है मेरी आंखों की,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वो ज्योत
उनके प्यार से नही आंसू से जलती है।
क्या क्या कहूँ उनके बारे में
वो सर्वस्व हा मेरे जीवन में,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वह जीवन क्या
सुबह शाम उनकी यादों में ढलती है।
मेरा स्वाभिमान, मेरा आत्मविश्वास
मेरा हौसला, मेरी पहली और अन्तिम इच्छा,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की वो सब कुछ
जले हुए मोम की तरह पिघलती है।
उनका छूना, गले से लगाना
प्यार करना, वो अनमोल पल थे,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब ये बातें
मेरी कविताओं में ही मिलती है।
वो शाम जो उनके साथ बिताई
वो दिन जो उनके साथ गुजरें,
हर पल, सब कुछ, बस फर्क इतना ही है की
वो ना जाने क्यों सब कुछ भूल जाते है..
वो ज्योत है मेरी आंखों की,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वो ज्योत
उनके प्यार से नही आंसू से जलती है।
क्या क्या कहूँ उनके बारे में
वो सर्वस्व हा मेरे जीवन में,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वह जीवन क्या
सुबह शाम उनकी यादों में ढलती है।
मेरा स्वाभिमान, मेरा आत्मविश्वास
मेरा हौसला, मेरी पहली और अन्तिम इच्छा,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की वो सब कुछ
जले हुए मोम की तरह पिघलती है।
उनका छूना, गले से लगाना
प्यार करना, वो अनमोल पल थे,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब ये बातें
मेरी कविताओं में ही मिलती है।
वो शाम जो उनके साथ बिताई
वो दिन जो उनके साथ गुजरें,
हर पल, सब कुछ, बस फर्क इतना ही है की
वो ना जाने क्यों सब कुछ भूल जाते है..
Monday, May 18, 2009
पिघलता दिल
सब कहते है प्यार करो तो पूरा करो
पर हमारा प्यार तो अधूरा रह गया,
जिस पन्ने पर पूरी ज़िन्दगी लिखनी थी
वह पन्ना ही पूरा रह गया।
कहना था बहुत कुछ उनके सामने
लेकिन समय ने क्या दिन दिखाया,
सब कुछ कह देने पर भी कुछ नही
मानो गाकर भी मैं बेसुरा रह गया।
जब हमने प्यार किया, निः स्वार्थ किया
क्या दिन, क्या रात, क्या आगे, क्या पीछे,
फिर से सब कुछ समेटा तो पाया
प्यार कहाँ वो तो पुरा ही अधुरा रह गया।
शायद वो उन पलों को भूल चुके है
जो हमने उनके साथ बिताये थे,
उनका शर्माना, सिमटना, गले से लगना
प्यार शब्द का पहला अक्षर ही अधूरा रह गया..
पर हमारा प्यार तो अधूरा रह गया,
जिस पन्ने पर पूरी ज़िन्दगी लिखनी थी
वह पन्ना ही पूरा रह गया।
कहना था बहुत कुछ उनके सामने
लेकिन समय ने क्या दिन दिखाया,
सब कुछ कह देने पर भी कुछ नही
मानो गाकर भी मैं बेसुरा रह गया।
जब हमने प्यार किया, निः स्वार्थ किया
क्या दिन, क्या रात, क्या आगे, क्या पीछे,
फिर से सब कुछ समेटा तो पाया
प्यार कहाँ वो तो पुरा ही अधुरा रह गया।
शायद वो उन पलों को भूल चुके है
जो हमने उनके साथ बिताये थे,
उनका शर्माना, सिमटना, गले से लगना
प्यार शब्द का पहला अक्षर ही अधूरा रह गया..
दर्द
भूलना चाह पर भूल न पाये
अपनी यादों से उनको छोड़ न सकें,
सारे सपने टूटकर बिखर गए
जब हम उनको पा न सकें।
कैसे भूल सकता हूँ उन पलों को
सबसे अनमोल, सबसे हसीं,
सब उन यादों क सहारे रोते है, जीते है
जब वो हमारी ज़िन्दगी में आ न सके।
हर वक्त लगता है क्या कमी थी
क्या हमारा प्यार इतना कमजोर था,
टूट गया सिर्फ़ एक झोंके से
वो चले गए और हम बुला न सके।
न जाने किसकी नजर लगी हमें
सब कुछ बिखर गया एक पल में,
हर रात उनको तीन गीत सुनने थे
लेकिन विडंबना हम एक भी गा न सके।
हे इश्वर तू भी क्या- क्या दिखाता है
कभी मिलाता है तो कभी जुदाई देता है,
क्या हमने कोई गलती की थी?
जिसका कर्ज आज भी चुका न सके..
अपनी यादों से उनको छोड़ न सकें,
सारे सपने टूटकर बिखर गए
जब हम उनको पा न सकें।
कैसे भूल सकता हूँ उन पलों को
सबसे अनमोल, सबसे हसीं,
सब उन यादों क सहारे रोते है, जीते है
जब वो हमारी ज़िन्दगी में आ न सके।
हर वक्त लगता है क्या कमी थी
क्या हमारा प्यार इतना कमजोर था,
टूट गया सिर्फ़ एक झोंके से
वो चले गए और हम बुला न सके।
न जाने किसकी नजर लगी हमें
सब कुछ बिखर गया एक पल में,
हर रात उनको तीन गीत सुनने थे
लेकिन विडंबना हम एक भी गा न सके।
हे इश्वर तू भी क्या- क्या दिखाता है
कभी मिलाता है तो कभी जुदाई देता है,
क्या हमने कोई गलती की थी?
जिसका कर्ज आज भी चुका न सके..
दास्ताँ
क्यूँ करते हो इन्तजार किसी का
सारी दुनिया पड़ी है जीने को,
क्यूँ मरते हो हर लम्हा- हर पल
विष ही क्यूँ, अमृत भी है पीने को।
प्यार तो कर लिया निभाया भी
कुछ वक्त के बाद रंग फीका पड़ गया,
जब ख़ुद को देखा तो कुछ न था वहाँ
जहाँ सारा संसार पड़ा था जीने को।
क्या करूँ- क्या कहूँ, कुछ भी समझ नही
क्या मरुँ- क्या जीयूं, सब एक जैसा,
बहुत पीछे छोड़ आया अपने आप को
अब बाकी है तो सिर्फ़ दर्द सीने को।
जब वो हमारे ख्यालों में आते थे
दिल क तार ख़ुद बज जाते थे,
लेकिन अब वो आते है, जाते है
कुछ नही होता
कोई भी तमन्ना न बची अब मिलने को..
सारी दुनिया पड़ी है जीने को,
क्यूँ मरते हो हर लम्हा- हर पल
विष ही क्यूँ, अमृत भी है पीने को।
प्यार तो कर लिया निभाया भी
कुछ वक्त के बाद रंग फीका पड़ गया,
जब ख़ुद को देखा तो कुछ न था वहाँ
जहाँ सारा संसार पड़ा था जीने को।
क्या करूँ- क्या कहूँ, कुछ भी समझ नही
क्या मरुँ- क्या जीयूं, सब एक जैसा,
बहुत पीछे छोड़ आया अपने आप को
अब बाकी है तो सिर्फ़ दर्द सीने को।
जब वो हमारे ख्यालों में आते थे
दिल क तार ख़ुद बज जाते थे,
लेकिन अब वो आते है, जाते है
कुछ नही होता
कोई भी तमन्ना न बची अब मिलने को..
तुम्हारी कमी सी है
आज अकेले हम रहते है
जीते है, मरते है, क्या क्या करते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
नजरें चारो दिशाओं में घूम
वापस एक जगह पर आकर टिकती है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
जब हम अकेले होते है
यह सोचकर वक्त गुजार देते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
हर सुबह लगता है की
वो हमारे लिए बनी है, आएगी,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
उस प्यार का क्या मतलब
जिसका कोई भी वजूद न हो,
बस इस बात का गम है
आज भी- तुम्हारी कमी सी है..
जीते है, मरते है, क्या क्या करते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
नजरें चारो दिशाओं में घूम
वापस एक जगह पर आकर टिकती है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
जब हम अकेले होते है
यह सोचकर वक्त गुजार देते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
हर सुबह लगता है की
वो हमारे लिए बनी है, आएगी,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.
उस प्यार का क्या मतलब
जिसका कोई भी वजूद न हो,
बस इस बात का गम है
आज भी- तुम्हारी कमी सी है..
उस वक्त
जब प्यार हुआ, इकरार हुआ
बात बढ़ी, जुदाई घटी, लम्हा कटा
उस वक्त- हम साथ साथ थे.
जब समय का चक्का चला
प्यार और बढ़ा, चरण सीमा तक
उस वक्त- हम साथ साथ थे।
जब वक्त आया उनकी कमी का
बेखुदी बढ़ी, दूरियां बढ़ी,
उस वक्त- हम साथ साथ न थे।
जब टूटने लगे, जान जाने लगी
लगता था क्या है उनके बिना
उस वक्तहम साथ साथ न थे।
जब वक्त आएगा, उनको जरुरत होगी
तड़प होगी प्यार होगा
उस वक्त- शायद हम न होंगे।
जब वक्त आएगा, वो अपने आप को
संसार में अकेला महसूस करेंगे
उस वक्त- शायद हम न होंगे..
बात बढ़ी, जुदाई घटी, लम्हा कटा
उस वक्त- हम साथ साथ थे.
जब समय का चक्का चला
प्यार और बढ़ा, चरण सीमा तक
उस वक्त- हम साथ साथ थे।
जब वक्त आया उनकी कमी का
बेखुदी बढ़ी, दूरियां बढ़ी,
उस वक्त- हम साथ साथ न थे।
जब टूटने लगे, जान जाने लगी
लगता था क्या है उनके बिना
उस वक्तहम साथ साथ न थे।
जब वक्त आएगा, उनको जरुरत होगी
तड़प होगी प्यार होगा
उस वक्त- शायद हम न होंगे।
जब वक्त आएगा, वो अपने आप को
संसार में अकेला महसूस करेंगे
उस वक्त- शायद हम न होंगे..
Tuesday, May 5, 2009
प्यार में
कभी तो कोई प्यार कर जाता,
शायद हम भी प्यासे है प्यार के,
न जाने कब वो लम्हा आएगा,
बैठे वक्त काट लेते इन्तजार के.
सब आते है हँसाते है, रुलाते है,
समझते है, समझाते है, मनाते है,
पर कोई ये समझने को तैयार नही,
शायद हम भी प्यासे है दीदार के.
कभी-कभी लगता है जैसे की,
उसके बिना दुनिया में कुछ भी नही,
क्या करें समझ नही आता,
क्यूँ समेटते है लम्हे इनकार के.
कभी-कभी लगता है जैसे की,
सब कुछ भूल जाऊं, क्या शुरू, क्या अंत,
फिर अचानक ख़याल आता है,
क्या बुराई है एक तरफा प्यार में.
सब जानते है कशिश है प्यार में,
मिलना, बिछड़ना , हसना, रोना,
पागलपन, बेखुदी , दर्द, मर्म सब कुछ,
पर क्या करें कम्बखत हम भी है प्यार में..
शायद हम भी प्यासे है प्यार के,
न जाने कब वो लम्हा आएगा,
बैठे वक्त काट लेते इन्तजार के.
सब आते है हँसाते है, रुलाते है,
समझते है, समझाते है, मनाते है,
पर कोई ये समझने को तैयार नही,
शायद हम भी प्यासे है दीदार के.
कभी-कभी लगता है जैसे की,
उसके बिना दुनिया में कुछ भी नही,
क्या करें समझ नही आता,
क्यूँ समेटते है लम्हे इनकार के.
कभी-कभी लगता है जैसे की,
सब कुछ भूल जाऊं, क्या शुरू, क्या अंत,
फिर अचानक ख़याल आता है,
क्या बुराई है एक तरफा प्यार में.
सब जानते है कशिश है प्यार में,
मिलना, बिछड़ना , हसना, रोना,
पागलपन, बेखुदी , दर्द, मर्म सब कुछ,
पर क्या करें कम्बखत हम भी है प्यार में..
Sunday, April 26, 2009
Monday, April 20, 2009
Sunday, April 19, 2009
Thursday, April 16, 2009
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