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Tuesday, August 17, 2010

चुप्पी

परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
वही लोग रहते है खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है.

Saturday, January 30, 2010

मजबूरियाँ

मैं एक सफ़र पर था

और मेरे साथ

थी

मुझे कभी अकेला न छोड़ने वाली

मेरी तन्हाई...

सुनसान राह पर

उसने हमेशा एहसास दिलाया

कि

वो मेरे साथ है।

रास्ता बहुत लम्बा था,

मंजिल

नजर से कोसों दूर।

मन बहलाने के लिए

ये सोच लेता था कि

मुझसे अच्छा कोई नहीं,

क्योंकि...

इस राह पर

मैं अकेला था और कोई नहीं,

अजब सी मुश्किल में फस गया हूँ,

कि

मैं इस राह पर अकेला हूँ

या

मेरी तन्हाई भी है।

दोनों ही सूरत में...

अगर मैं अकेला हूँ,

तो खुद को धोखा दे रहा हूँ

और अगर

तन्हाई साथ है

तो भी

खुद को धोखा दे रहा हूँ,

कोई तो बताये,

मेरी मजबूरियों का हाल...

मैं खुद को बचा रहा हूँ

या

खुद से बच रहा हूँ....

ज्वालामुखी

अक्सर...
ऐसा होता है

कि

मैं चुप रहता हूँ

और लोग समझते है

कि

मैं कायर,

डरपोक, निहत्ता हूँ।

लेकिन...

मेरे अन्दर जो

सैलाब उबल रहा है,

जो लावा जल रहा है,

मैं उसे

पर्सुप्त रखना चाहता हूँ,

क्योंकि

मैं चाहता हूँ कि ये

ज्वालामुखी उनपर फटे

जिसना कायरता को

महान बनाया

और मुझ जैसे को

कायर इंसान बनाया...

कश्मकश

बहुत दिनों के बाद,
आज
कुछ उम्मीद सी जगी है
मन व्याकुल सा है,
सासें धीरे-धीरे हवा में
अपना अस्तित्व घोल रही है,
आँखों में धुन्धरी सी चमक
लगता है कि
कोहरे में हलकी सी धुप
निकल आई हो
शरीर ठंडा पड़ गया है
मगर
आत्मा अभी भी
गर्म होने कि
आस दिलाये बैठी है।
क्या कोई बताएगा
कि
जिन्दगी एक ही पल में
इतने सारे मकाम क्यों लाती है?
या आज फिर से
अपनी उम्मीदों को
टूटता देखना पड़ेगा...