कोई रात पूनम तो कोई है अमावस,
चांदनी उसकी जो चाँद पाना सीख ले।
यूँ तो सभी आये है रोते हुए जहां में,
पर सारा जहां है उसी का जो मुस्कुराना सीख ले।
कुछ भी नजर न आये अंधेरों में रहकर,
रौशनी है उसी कि जो शमा जलना सीख ले।
हर गली में मंदिर हर राह में मस्जिद,
पर खुदा है उसी का जो सर झुकाना सीख ले।
हर सीने में दिल हर दिल में है प्यार,
सुख उसी को मिलता है जो दिल लगाना सीख ले।
लोगों का काफ़िला होगा हमेशा साथ उसके,
जो तहे दिल से रिश्ते निभाना सीख ले।
एक ख़ुशी कि तलाश में जिंदगी गुजर जाती है,
पास खुशियाँ उसे नसीब जो दूसरों के गम मिटाना सीख ले।
Saturday, September 3, 2011
Tuesday, May 17, 2011
मुद्दत से जिसके वास्ते दिल बेक़रार था,
वो लौट कर न आये मगर इन्तजार था,
वो हमसफ़र था छोड़ गया राह में मुझे,
मैं फँस गया भंवर में वो दरिया के पार था,
मंजिल करीब आई तो तुम दूर हो गए,
इतना तो तुम बताओ कि ये कैसा प्यार था,
दीवार बना दी ये किसने दोनों के दरमियान,
न वो सुकून से बैठा न मुझको करार था,
ये बात उम्र भर समझ न पाया मैं,
क्यों दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था...
खालीद..
वो लौट कर न आये मगर इन्तजार था,
वो हमसफ़र था छोड़ गया राह में मुझे,
मैं फँस गया भंवर में वो दरिया के पार था,
मंजिल करीब आई तो तुम दूर हो गए,
इतना तो तुम बताओ कि ये कैसा प्यार था,
दीवार बना दी ये किसने दोनों के दरमियान,
न वो सुकून से बैठा न मुझको करार था,
ये बात उम्र भर समझ न पाया मैं,
क्यों दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था...
खालीद..
जुर्म
बेबसी जुर्म है, हौसला जुर्म है,
ज़िन्दगी तेरी एक-एक अदा जुर्म है,
वाकई तेरे बारे में कुछ सोचकर,
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है,
याद रखना तुझे मेरा एक जुर्म था,
भूल जाना तुझे दूसरा जुर्म है,
क्या सितम है कि तेरे हसीं शहर में,
हर तरफ गौर से देखना जुर्म है,
मुन्तजिर हूँ किसी का मगर क्या करूँ,
राह में देर तक बैठना जुर्म है,
उफ़ वो अजम-इ-वफ़ा उफ़ ये तर्क-इ वफ़ा,
वो मेरा जुर्म था ये तेरा जुर्म है,
ऐ "रामू" आपकी कुछ खबर ही नही,
इन दिनों ऐतबार ऐ वफ़ा जुर्म है...
जगजीत सिंह....
ज़िन्दगी तेरी एक-एक अदा जुर्म है,
वाकई तेरे बारे में कुछ सोचकर,
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है,
याद रखना तुझे मेरा एक जुर्म था,
भूल जाना तुझे दूसरा जुर्म है,
क्या सितम है कि तेरे हसीं शहर में,
हर तरफ गौर से देखना जुर्म है,
मुन्तजिर हूँ किसी का मगर क्या करूँ,
राह में देर तक बैठना जुर्म है,
उफ़ वो अजम-इ-वफ़ा उफ़ ये तर्क-इ वफ़ा,
वो मेरा जुर्म था ये तेरा जुर्म है,
ऐ "रामू" आपकी कुछ खबर ही नही,
इन दिनों ऐतबार ऐ वफ़ा जुर्म है...
जगजीत सिंह....
Saturday, February 12, 2011
परिंदा
परिंदों को मंजिल मिलेगी यकीनन
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
वही लोग रहते है खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है।
अन्जान कवि....
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
वही लोग रहते है खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है।
अन्जान कवि....
Subscribe to:
Posts (Atom)
