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Wednesday, August 5, 2009

मेरे नसीब की दास्ताँ नसीब जैसी ही रही
न कोई चाहत और न कोई उम्मीद है,
सोचा कुछ देर गुफ्तगू हो जाए मेज़ पर बैठे
एक अरसे के बाद आज तन्हाई अकेली मिली थी.

इंतज़ार

इंतज़ार...
इंतज़ार...
पता नही कब
बेरंग आंखों में
समाई
इन तस्वीरों में
कम ही सही
पर रंग तो भर जाए
क्योंकि
इसी रंग ने कभी
मेरे जीवन को
बेरंग किया है,
पर जब
बेरंग हो रहा था
सुकून था
किसी की मौजूदगी का
शायद इसलिए
आज भी
उस रंग का मुझे है
इंतज़ार...
इंतज़ार...
इंतज़ार...

शब्द

अक्सर लिखते-लिखते
मेरी कलम रुक जाती है
सोचता हूँ की मैं
क्यों और क्या लिख रहा हूँ।


फिर अचानक असंख्य शब्द
मेरे मन की गहराई में
गूंजने लगते है, फिर सोचता हूँ की
क्या मैं जीना सीख रहा हूँ।

उधार के शब्दों से अपने जीवन का
क़र्ज़ उतारना चाहता हूँ
पर मजबूर होकर फिर सोचता हूँ की
क्या मैं वो हूँ जो दिख रहा हूँ।

शब्दों से अनंत शंघर्ष के बाद
ख़ुद को वहीँ खड़ा देख, हैरान....
और फिर वही सोचता हूँ की
मैं क्यों और क्या लिख रहा हूँ।

बारिश

वो जो दीवाना था
मासूम सा दीखता था
अपनी ही दर्द की अमीरी में
सुबह-शाम बिकता था।

आंसू का जाम छलकता
उसकी आंखों के पैमाने से
ख़ुद के अश्क में वो
तन-बदन भीगता था।

लोग कहते है की
उसकी कहानी पूरी हुई
पर हर
नकाबपोश चेहरे में
वो अक्सर मुझे दीखता था।

आज कलम कुछ बयान करे
वो समय भी आ गया था
टपक गए आंसू उसके मेरी आँख से
जब मैं उसके बारे मी लिखता था.