BLOGGER TEMPLATES AND TWITTER BACKGROUNDS »

Friday, May 22, 2009

ग़ज़ल ज़रा

तू मुझको देना जिंदगी हर मोड़ पर मरहम ज़रा,
मैं हूँ समझता वक्त के जालिम इशारे कम ज़रा।

हर इम्तिहान उस दौर का अब भी मुझे सब याद है,
मीलों के थे फांसले और धुप के मौसम ज़रा।

आकाश में उड़ते रहे जब परकटी यादों के पर,
क्यों राहतों के दौर में थे दिल में फ़िर मातम ज़रा।

मुकम्मल तेरी बातों में क्यूँ वो दर्द- सा बहता नही,
अब छोड़ बातें चाँद की भर आँख में शबनम ज़रा..

No comments:

Post a Comment