आदमी ख़ुद को कभी यूँ भी सज़ा देता है,
रौशनी के लिए शोलों को हवा देता है।
खून के दाग है दामन पे जहाँ सन्तों के,
तू वहाँ कौन से नानक को सदा देता है।
एक ऐसा भी वो तीरथ है मेरी धरती पर,
कातिलों को जहाँ मन्दिर भी दुआ देता है।
मुझको उस वैध्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।
चील- कौओं की अदालत में है मुजरिम कोयल,
देखिये वक्त ये अब फ़ैसला क्या देता है।
तू खड़ा हो के कहाँ मांग रहा है रोटी,
ये सियासत का नगर सिर्फ़ दगा देता है।
मैं किसी बच्चे की मानीन्द सुबक उठता हूँ,
जब कोई माँ की तरह मुझको दुआ देता है।
साँस के बोझ से जब रूह तड़प उठती है,
वो तेरा प्यार है जो दिल को हवा देता है।
मत उसे ढूँढिये शब्दों के नुमायश घर में,
हर पपीहा यहाँ " नीरज " का पता देता है.
Saturday, June 6, 2009
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