Saturday, September 3, 2011
सलाह
चांदनी उसकी जो चाँद पाना सीख ले।
यूँ तो सभी आये है रोते हुए जहां में,
पर सारा जहां है उसी का जो मुस्कुराना सीख ले।
कुछ भी नजर न आये अंधेरों में रहकर,
रौशनी है उसी कि जो शमा जलना सीख ले।
हर गली में मंदिर हर राह में मस्जिद,
पर खुदा है उसी का जो सर झुकाना सीख ले।
हर सीने में दिल हर दिल में है प्यार,
सुख उसी को मिलता है जो दिल लगाना सीख ले।
लोगों का काफ़िला होगा हमेशा साथ उसके,
जो तहे दिल से रिश्ते निभाना सीख ले।
एक ख़ुशी कि तलाश में जिंदगी गुजर जाती है,
पास खुशियाँ उसे नसीब जो दूसरों के गम मिटाना सीख ले।
Tuesday, May 17, 2011
वो लौट कर न आये मगर इन्तजार था,
वो हमसफ़र था छोड़ गया राह में मुझे,
मैं फँस गया भंवर में वो दरिया के पार था,
मंजिल करीब आई तो तुम दूर हो गए,
इतना तो तुम बताओ कि ये कैसा प्यार था,
दीवार बना दी ये किसने दोनों के दरमियान,
न वो सुकून से बैठा न मुझको करार था,
ये बात उम्र भर समझ न पाया मैं,
क्यों दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था...
खालीद..
जुर्म
ज़िन्दगी तेरी एक-एक अदा जुर्म है,
वाकई तेरे बारे में कुछ सोचकर,
अपने बारे में कुछ सोचना जुर्म है,
याद रखना तुझे मेरा एक जुर्म था,
भूल जाना तुझे दूसरा जुर्म है,
क्या सितम है कि तेरे हसीं शहर में,
हर तरफ गौर से देखना जुर्म है,
मुन्तजिर हूँ किसी का मगर क्या करूँ,
राह में देर तक बैठना जुर्म है,
उफ़ वो अजम-इ-वफ़ा उफ़ ये तर्क-इ वफ़ा,
वो मेरा जुर्म था ये तेरा जुर्म है,
ऐ "रामू" आपकी कुछ खबर ही नही,
इन दिनों ऐतबार ऐ वफ़ा जुर्म है...
जगजीत सिंह....
Saturday, February 12, 2011
परिंदा
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
वही लोग रहते है खामोश अक्सर
ज़माने में जिनके हुनर बोलते है।
अन्जान कवि....
Tuesday, August 17, 2010
चुप्पी
ये फैले हुए उनके पर बोलते है,
Saturday, January 30, 2010
मजबूरियाँ
और मेरे साथ
थी
मुझे कभी अकेला न छोड़ने वाली
मेरी तन्हाई...
सुनसान राह पर
उसने हमेशा एहसास दिलाया
कि
वो मेरे साथ है।
रास्ता बहुत लम्बा था,
मंजिल
नजर से कोसों दूर।
मन बहलाने के लिए
ये सोच लेता था कि
मुझसे अच्छा कोई नहीं,
क्योंकि...
इस राह पर
मैं अकेला था और कोई नहीं,
अजब सी मुश्किल में फस गया हूँ,
कि
मैं इस राह पर अकेला हूँ
या
मेरी तन्हाई भी है।
दोनों ही सूरत में...
अगर मैं अकेला हूँ,
तो खुद को धोखा दे रहा हूँ
और अगर
तन्हाई साथ है
तो भी
खुद को धोखा दे रहा हूँ,
कोई तो बताये,
मेरी मजबूरियों का हाल...
मैं खुद को बचा रहा हूँ
या
खुद से बच रहा हूँ....
ज्वालामुखी
ऐसा होता है
कि
मैं चुप रहता हूँ
और लोग समझते है
कि
मैं कायर,
डरपोक, निहत्ता हूँ।
लेकिन...
मेरे अन्दर जो
सैलाब उबल रहा है,
जो लावा जल रहा है,
मैं उसे
पर्सुप्त रखना चाहता हूँ,
क्योंकि
मैं चाहता हूँ कि ये
ज्वालामुखी उनपर फटे
जिसना कायरता को
महान बनाया
और मुझ जैसे को
कायर इंसान बनाया...
कश्मकश
आज
कुछ उम्मीद सी जगी है
मन व्याकुल सा है,
सासें धीरे-धीरे हवा में
अपना अस्तित्व घोल रही है,
आँखों में धुन्धरी सी चमक
लगता है कि
कोहरे में हलकी सी धुप
निकल आई हो
शरीर ठंडा पड़ गया है
मगर
आत्मा अभी भी
गर्म होने कि
आस दिलाये बैठी है।
क्या कोई बताएगा
कि
जिन्दगी एक ही पल में
इतने सारे मकाम क्यों लाती है?
या आज फिर से
अपनी उम्मीदों को
टूटता देखना पड़ेगा...
Tuesday, September 29, 2009
अन्तर
पीढी दर पीढी के लोगों में
कोई कहता है कि
ज़माना बदल गया है
आरोपी तो मनुष्य है
क्योंकि
उसने ज़माने को बदल दिया।
कल तक माँ का दूध पीकर
बच्चों कि हड्डियां फौलाद बनती थी
लेकिन आज....
शराब पीकर माँ के दूध को
हड्डियों को पिघलाया जाता है
अजब तो तब लगता है
जब
मिट्टी कि सौंधी खुशबू
गाँव के अनजान, अंधेर भरे
टेढ़े- मेढ़े गलियारों से होकर
नुक्कड़ के पीछे की
वो पुरानी झोपडी देखता हूँ,
पता चलता है की
आज-कल
उस झोपडी का वजूद
विदेश कि किसी बड़ी
अट्टालिका में पल रहा है....
