" अभिषेक पाटनी "
अक्सर
सोचता हूँ
गाँव की गलियों से
शहर के
रास्तों तक के
सफर के बारे में
और
अक्सर
कुछ हाथ नही लगता
सिर्फ़ दिखती है
खामोश रात में
रौशनी से सराबोर
शहर की
किसी सुनसान सड़क पर
ख़ुद से लम्बी ख़ुद की
कई हलकी परछाइयां..
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