" जियाउर रहमान जाफरी "
जो पढ़ चुका था वही फ़िर किताब क्या देती
वह मेरे हाथ में ताज़ा गुलाब क्या देती।
अभी तो अपनी मोहब्बत की इब्तिदा ही थी
अभी से ख़त का हमारे जवाब क्या देती।
मैं पूछता ही भला क्यों सबब भुलाने का
वह बेवफा थी वफ़ा का हिसाब क्या देती।
मैं उसी बज्म में तारवीर से ही पहुँचा था
पिला चुकी थी बहुत अब शराब क्या देती।
सहेज कर जिसे रखा था उम्र भर उसने
मज़े किसी को लुटाकर शराब क्या देती।
हमारे दिल को बहरहाल टूट जाना था
जो नींद छीन चुकी थी वह ख्वाब क्या देती।
गिरा ही देती वह बिजली भरी जवानी की
हटा के चेहरे से अपने नकाब क्या देती..
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