ज़िन्दगी ने दिखाया वो दिन की
जीवन से नही मौत से प्यार है,
अब तो मरना छोटी बात हो गई
घुट- घुट के जीना भी इकरार है।
ऊपरवाले से हमने फरियाद की
एक दिन सूरज, एक दिन चाँद के लिए माँगा,
सूरज को तो कोई शिकवा न थी हमसे
पर चाँद को आज भी इनकार है।
अब जीना है तो अपनों के लिए
अपने लिए जीने की कोई ख्वाहिश नही,
किनारा सोचा था हमने, जहाँ खड़े थे
पल भर में पता चला वह एक मंज्धार है।
चार दिन थे दिवाली के ज़िन्दगी में
कब आए पता नही कब गए पता नही,
मालूम होता है मेरे पंचांग में
पूरा जीवन रोजे का त्यौहार है।
हम भूल गए थे की चाँद साथ नही है
इसलिए शायद पलक पूरी रात खुली रहती है,
ढूंढते है हम अपने चाँद को आकाश में
फिर भूल गए हम की आज अमावस्या का वार है।
शायद इसलिए आज भी पलक खुलने पर
चौदहवीं के चाँद का इन्तजार है..
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