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Friday, May 22, 2009

इन दिनों

दिल खौफ उजालों से खाए है इन दिनों,
अपनी ही परछाई डराए है इन दिनों।

है कौन? कहाँ के है? यहाँ आए किसलिए?
दिल ये सवालात उठाये है इन दिनों।

अच्छा हो जो कोई नकाब उनका खेंच ले,
आइना जो जमाने को दिखाए है इन दिनों।

यादों का समंदर और ये अश्कों की चांदनी,
साँसों में कोई तूफ़ान उठाये है इन दिनों।

चलना है बहुत दूर पाँव में छालों के बावजूद,
आवाज़ कोई दूर से बुलाये है इन दिनों..

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