" गुलज़ार "
वो जो शायर था चुप- सा रहता था
बहकी- बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था
गूंगी खामोशियों की आवाजें
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे- रूखे से रात के पत्ते
ओक में भर के खरखराता था
वक्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे- पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर
रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिरकर मर गया है वो
लोग कहते है खुदखुशी की है..
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