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Wednesday, August 5, 2009

शब्द

अक्सर लिखते-लिखते
मेरी कलम रुक जाती है
सोचता हूँ की मैं
क्यों और क्या लिख रहा हूँ।


फिर अचानक असंख्य शब्द
मेरे मन की गहराई में
गूंजने लगते है, फिर सोचता हूँ की
क्या मैं जीना सीख रहा हूँ।

उधार के शब्दों से अपने जीवन का
क़र्ज़ उतारना चाहता हूँ
पर मजबूर होकर फिर सोचता हूँ की
क्या मैं वो हूँ जो दिख रहा हूँ।

शब्दों से अनंत शंघर्ष के बाद
ख़ुद को वहीँ खड़ा देख, हैरान....
और फिर वही सोचता हूँ की
मैं क्यों और क्या लिख रहा हूँ।

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