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Tuesday, May 19, 2009

गुजरे पल

कुछ पलछिन और पुरानी यादों को समेट
आज मैं एक कविता लिख रहा हूँ,
एक बड़े और खुशहाल जीवन को छोड़
बीती यादो के सहारे जी रहा हूँ।

क्या नही, उनको, उनकी गलियाँ, शहर
सब कुछ छोड़ आया वहाँ, यहाँ अकेला,
रहता हूँ गुमनाम गुमसुम सा
दिखाता हूँ की अमृत पी रहा हूँ।

उनका क्या करूँ जो अविश्वसनीय
तेजी से मेरे अन्दर दफ़न हो गई,
यादों को मिटाना असंभव सा लगता
अपनी आंखों में तस्वीर लिए फिरता हूँ।

कभी न भूल पाऊंगा उनकी खुशबू
उनकी साँसे, उनकी थिरकन, उनकी आवाज,
बस अब यही तो जीने का सहारा है
मरकर भी रोज जिंदगी जी रहा हूँ..

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