कौन कहता है
दीकार नही होता,
आदमी ख़ुद ही
तलबगार नही होता।
तुम उसे प्यार करो
वो न तुम्हे प्यार करे,
बेखबर इतना कभी
करतार नही होता।
तुम पुकारो तो सही
दिल से उस दिलबर को,
देखना कैसे वो
साकार नही होता।
तू जब अपनी खुदी को
ख़ुद ही नही मिटाता है,
फिर तो भगवान् का
दीदार कैसे होता है..
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