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Thursday, May 28, 2009

किसी ने ठीक कहा है कि -

" हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता,
किसी को जमीं तो किसी को आसमां नही मिलता।"

लेकिन मेरी भी एक नसीयत लोगों को है कि -

" हर किसी को मुकम्मल जहाँ नही मिलता
किसी को जमीं तो किसी को आसमां नही मिलता,
ज़िन्दगी है तो दर्द को झेलना भी सिख लो
वरना सुख का सागर कहाँ नही मिलता."

Saturday, May 23, 2009

हमसफ़र

आपकी जिस किसी पे नजर हो गई
जिंदगी उसकी मुनव्वर हो गई है.

मेरी हर राह हर मुकाम हो तुम
और मंजिल तेरा घर हो गई है।

ज़ख्म भरते नही दर्द जाता नही
चोट दिल पे इस कदर हो गई है।

जबसे तुमको मैंने तनहा देखा है
मेरी हालत और बदतर हो गई है।

कह नही सकता यूँ हाल-ऐ-दिल तुमसे
और चर्चा शहर भर हो गई है।

दूर कर ले तू मुझको ख़ुद से साथी
तेरी यादें मेरी हमसफ़र हो गई है..
शरारत न होती, शिकायत न होती
जो आंखों में उनके नजाकत न होती,
न होती बेकरारी, न होते हम तनहा
जो जहाँ में कम्बखत मोहब्बत न होती..

मोहब्बत की इब्तिदा

" जियाउर रहमान जाफरी "

जो पढ़ चुका था वही फ़िर किताब क्या देती
वह मेरे हाथ में ताज़ा गुलाब क्या देती।

अभी तो अपनी मोहब्बत की इब्तिदा ही थी
अभी से ख़त का हमारे जवाब क्या देती।

मैं पूछता ही भला क्यों सबब भुलाने का
वह बेवफा थी वफ़ा का हिसाब क्या देती।

मैं उसी बज्म में तारवीर से ही पहुँचा था
पिला चुकी थी बहुत अब शराब क्या देती।

सहेज कर जिसे रखा था उम्र भर उसने
मज़े किसी को लुटाकर शराब क्या देती।

हमारे दिल को बहरहाल टूट जाना था
जो नींद छीन चुकी थी वह ख्वाब क्या देती।

गिरा ही देती वह बिजली भरी जवानी की
हटा के चेहरे से अपने नकाब क्या देती..

वो जो शायर था चुप सा रहता था

" गुलज़ार "

वो जो शायर था चुप- सा रहता था
बहकी- बहकी सी बातें करता था
आँखें कानों पे रख के सुनता था

गूंगी खामोशियों की आवाजें
जमा करता था चाँद के साए
और गीली- सी नूर की बूँदें
रूखे- रूखे से रात के पत्ते

ओक में भर के खरखराता था
वक्त के इस घनेरे जंगल में
कच्चे- पक्के से लम्हे चुनता था
हाँ वही, वो अजीब सा शायर

रात को उठ के कोहनियों के बल
चाँद की ठोडी चूमा करता था
चाँद से गिरकर मर गया है वो
लोग कहते है खुदखुशी की है..

घोंसला

" मूर्तिदेव "

..... मैं चाहता हूँ
कि चिडियां
मुझे भी
यह सब सिखाये .....
कि किस तरह
असीम आकाश में
उड़ने का एहसास
एक घोंसले में
रहकर भी
जीवित रखा जा सकता है..

कवि

" वेणुगोपाल "

आपकी ग़लत मांग है
कवि से
कि वह खरीदकर
पिए
ज़िन्दगी के बारे में
कुछ कहने से पहले
ज़िन्दगी जिए
वरना चुपचाप रहे
होंठ सिये
आख़िर कवि है वह
और कसूर आपका है
कि आप ही ने बता रखा है उसे
कि वह वहाँ पहुँच सकता है
जहाँ रवि नही पहुँच सकता..

परछाइयां

" अभिषेक पाटनी "

अक्सर
सोचता हूँ
गाँव की गलियों से
शहर के
रास्तों तक के
सफर के बारे में
और
अक्सर
कुछ हाथ नही लगता
सिर्फ़ दिखती है
खामोश रात में
रौशनी से सराबोर
शहर की
किसी सुनसान सड़क पर
ख़ुद से लम्बी ख़ुद की
कई हलकी परछाइयां..

Friday, May 22, 2009

अन्तर

" अखबार से ली हुई कुछ अहम् पंक्तियाँ "

जीव विज्ञानं की परीक्षा थी
वनस्पति और जंतु जगत में
ग्यारह अन्तर लिखने के बाद
उसमे डाली एक पाद- टिप्पणी-
सबसे अहम् अन्तर यह की
पड़ पौधे आत्म हत्या नही करते..

ग़ज़ल ज़रा

तू मुझको देना जिंदगी हर मोड़ पर मरहम ज़रा,
मैं हूँ समझता वक्त के जालिम इशारे कम ज़रा।

हर इम्तिहान उस दौर का अब भी मुझे सब याद है,
मीलों के थे फांसले और धुप के मौसम ज़रा।

आकाश में उड़ते रहे जब परकटी यादों के पर,
क्यों राहतों के दौर में थे दिल में फ़िर मातम ज़रा।

मुकम्मल तेरी बातों में क्यूँ वो दर्द- सा बहता नही,
अब छोड़ बातें चाँद की भर आँख में शबनम ज़रा..

यूँ तो जिंदगी में कभी कोई रिश्ता न था

बना तो आँसूं दिए आंसू मिले,

एहसास हुआ हम काबिल नही इन रिश्तों के लिए

ऐसे तो हम आवारा ठीक थे..

इन दिनों

दिल खौफ उजालों से खाए है इन दिनों,
अपनी ही परछाई डराए है इन दिनों।

है कौन? कहाँ के है? यहाँ आए किसलिए?
दिल ये सवालात उठाये है इन दिनों।

अच्छा हो जो कोई नकाब उनका खेंच ले,
आइना जो जमाने को दिखाए है इन दिनों।

यादों का समंदर और ये अश्कों की चांदनी,
साँसों में कोई तूफ़ान उठाये है इन दिनों।

चलना है बहुत दूर पाँव में छालों के बावजूद,
आवाज़ कोई दूर से बुलाये है इन दिनों..

चुप रहने दो मुझे, यूँ मजबूर न करो

कहीं मैं दामन खामोशी का चीर न दूँ,

फ़िर जो आहें निकलेगी तो सुन न सकोगे

जाने कितने जख्मों का दर्द सिमटा है मेरी साँसों में..

इक साँस के चलने का मज़ा इतना है

कि कुछ और तेरे दर पर कोई क्या मांगे..

कोई भी तो देखे

मेरी मजबूरियों का हाल

कि मैं उन्ही को याद कर रहा हूँ

जिन्हें भूलना चाहता हूँ..

मौन करुणा

" राम कुमार वर्मा "
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।

जानता हूँ इस जगत में फूलों की है आयु कितनी
और यौवन से उभरती साँसों में है वायु कितनी,
इसलिए आकाश का विस्तार सारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।

जोड़ कर कण- कण कृपण आकाश ने तारे सजाएं
जो की उज्जवल है सही पर क्या किसी के काम आए,
प्राण मैं तो मार्ग दर्शक बस एक तारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ।

यह उठा कैसा प्रभंजन जुड़ गई जैसे दिशाएँ
एक तरनी एक नाविक और कितनी आपदाएं,
संसार में सिर्फ़ मार्ग तुम्हारा चाहता हूँ
मैं तुम्हारी मौन करुणा का सहारा चाहता हूँ..

यह तौहीन है शराब की

के लोग पानी मिलाकर पीते है,

जिन्हें पीने का सलीका पता हो

वो लोग जिंदगानी मिलकर पीते है..

एक नाम क्या लिखा तेरा

साहिल की रेत पर जालिम,

फिर उम्र भर हवा से

मेरी दुश्मनी रही..

शाम होते ही

चिरागों को बुझा देता हूँ,

ये दिल ही काफ़ी है

तेरी याद में जलने के लिए..

मेरे नसीब की दास्ताँ, मेरे नसीब जैसी ही रही

न कोई चाहत और न कोई उम्मीद बाकी है,

सोचा कुछ देर गुफ्तुगू कर लूँ मेज़ पर बैठे

एक अरसे के बाद तन्हाई अकेली मिली थी..

Wednesday, May 20, 2009

पता नही हमें की हम क्या किए जा रहे है

कभी खुशी- कभी दर्द पीये हा रहे है,

कसूर उन निगाहों का था या हमारा न मालूम

आज भी उनकी यादों में जिए जा रहे है.

ऐ- शराब तुझे पीता हूँ इसलिए

की पूरे जमाने को जाहिर कर सकूँ,

नशा तुझमे नही है बल्कि

मुकम्मिल मेरी निगाहों में है.

सजी थी महफिल, चल रहे थे दौर

जाम में क्या था कौन कर रहा था गौर,

वो खून था मेरे अरमानो का जिसे पीकर

सब कह रहे थे एक जाम और- एक जाम और.

अक्सर ऐसा होता है की जब रात की वीरानियों में

उपरवाले से सवाल करता हूँ तो,

रात खामोश होकर जवाब दे जाती है की

मेरे सवाल का उसके पास कोई जवाब नही.

मेरी गहराई को नापना यूँ आसान न होगा

जाने कितना टूटे ख्वाब दफ़न है इस गहराई में,

वक्त हो जाएगा पूरा ख़त्म किस्मत का

ज़िन्दगी बीत जायेगी इसकी खुदाई में.

आज फिर दो पायदान खिसक गया मैं अपनी ही सोच से

गिर- गिरकर टूट गया मैं अपने ही सहारों से,

दामन कुछ ऐसे निचोडा की पानी आँख से टपका

दुःख और दर्द बांटा भी तो बेजुबान दीवारों से.

शेर-ओ-शायरी का दौर यूँ ही चलता रहा

शाम होते ही दिल मेरा ढलता रहा,

वो जलाते रहे हमें शमा समझकर

मोम बनकर मेरा दिल यूँ ही पिघलता रहा.

काफ़िला कौन चाहता है जालिम

दो गज जमीन काफ़ी है जीने के लिए,

पूरी ज़िन्दगी की जरुरत नही है हमें

दो लम्हे चाहिए उनपे मरने के लिए.

क्या होता अगर बन्दूक इंसान की कीमत जान जाती

तबाही न होती बेकसूरों की कभी न जान जाती,

बेरहमी न करो ऐ इंसान मेरे द्बारा

बन्दूक की जुबाँ होती और वह भी बोल पाती.

Tuesday, May 19, 2009

और भी

हकीकत का साया यूँ साथ हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला

जमानत पर लिए कुछ दिन चाह की सुधार लूँ
पर हिम्मत न थी की दोबारा फिर उधार लूँ,
फिर वही कगार वही समय हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।

अतीत की परत को वर्तमान से ढकना चाहा
अतीत ने फिर वर्तमान में महकना चाहा,
हर कर्म को अश्क धीरे धीरे धो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।

वक्त ने फिर एक बार अपना रुख मोडा
सामने देख किस्मत ने भी अपना मुख मोडा,
खोकर जो कुछ पाया उसे फिर खो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।

न जाने क्यों परछाई पीछा नही छोड़ती
बुरी किस्मत भी अपना दम क्यों नही तोड़ती,
खुली आंखों से अब पूरी रात मैं सो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।

एकबार फिर अतीत को सामने देख
पुराणी यादों के संग हो चला, न जाने क्यों..

इन्तजार

ज़िन्दगी ने दिखाया वो दिन की
जीवन से नही मौत से प्यार है,
अब तो मरना छोटी बात हो गई
घुट- घुट के जीना भी इकरार है।

ऊपरवाले से हमने फरियाद की
एक दिन सूरज, एक दिन चाँद के लिए माँगा,
सूरज को तो कोई शिकवा न थी हमसे
पर चाँद को आज भी इनकार है।

अब जीना है तो अपनों के लिए
अपने लिए जीने की कोई ख्वाहिश नही,
किनारा सोचा था हमने, जहाँ खड़े थे
पल भर में पता चला वह एक मंज्धार है।

चार दिन थे दिवाली के ज़िन्दगी में
कब आए पता नही कब गए पता नही,
मालूम होता है मेरे पंचांग में
पूरा जीवन रोजे का त्यौहार है।

हम भूल गए थे की चाँद साथ नही है
इसलिए शायद पलक पूरी रात खुली रहती है,
ढूंढते है हम अपने चाँद को आकाश में
फिर भूल गए हम की आज अमावस्या का वार है।

शायद इसलिए आज भी पलक खुलने पर
चौदहवीं के चाँद का इन्तजार है..

दीदार

कौन कहता है
दीकार नही होता,
आदमी ख़ुद ही
तलबगार नही होता।

तुम उसे प्यार करो
वो न तुम्हे प्यार करे,
बेखबर इतना कभी
करतार नही होता।

तुम पुकारो तो सही
दिल से उस दिलबर को,
देखना कैसे वो
साकार नही होता।

तू जब अपनी खुदी को
ख़ुद ही नही मिटाता है,
फिर तो भगवान् का
दीदार कैसे होता है..

गुजरे पल

कुछ पलछिन और पुरानी यादों को समेट
आज मैं एक कविता लिख रहा हूँ,
एक बड़े और खुशहाल जीवन को छोड़
बीती यादो के सहारे जी रहा हूँ।

क्या नही, उनको, उनकी गलियाँ, शहर
सब कुछ छोड़ आया वहाँ, यहाँ अकेला,
रहता हूँ गुमनाम गुमसुम सा
दिखाता हूँ की अमृत पी रहा हूँ।

उनका क्या करूँ जो अविश्वसनीय
तेजी से मेरे अन्दर दफ़न हो गई,
यादों को मिटाना असंभव सा लगता
अपनी आंखों में तस्वीर लिए फिरता हूँ।

कभी न भूल पाऊंगा उनकी खुशबू
उनकी साँसे, उनकी थिरकन, उनकी आवाज,
बस अब यही तो जीने का सहारा है
मरकर भी रोज जिंदगी जी रहा हूँ..

परछाई

क्या क्या कहूँ उनके बारे में
वो ज्योत है मेरी आंखों की,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वो ज्योत
उनके प्यार से नही आंसू से जलती है।

क्या क्या कहूँ उनके बारे में
वो सर्वस्व हा मेरे जीवन में,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब वह जीवन क्या
सुबह शाम उनकी यादों में ढलती है।

मेरा स्वाभिमान, मेरा आत्मविश्वास
मेरा हौसला, मेरी पहली और अन्तिम इच्छा,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की वो सब कुछ
जले हुए मोम की तरह पिघलती है।

उनका छूना, गले से लगाना
प्यार करना, वो अनमोल पल थे,
बस फर्क सिर्फ़ इतना है की अब ये बातें
मेरी कविताओं में ही मिलती है।

वो शाम जो उनके साथ बिताई
वो दिन जो उनके साथ गुजरें,
हर पल, सब कुछ, बस फर्क इतना ही है की
वो ना जाने क्यों सब कुछ भूल जाते है..

वो भी मौत थी, ये भी मौत है

वो भी ज़िन्दगी थी, ये भी ज़िन्दगी है,

अफ़सोस इस बात का है की अब तलक

पता न चला मौत और ज़िन्दगी का अन्तर..

Monday, May 18, 2009

पिघलता दिल

सब कहते है प्यार करो तो पूरा करो
पर हमारा प्यार तो अधूरा रह गया,
जिस पन्ने पर पूरी ज़िन्दगी लिखनी थी
वह पन्ना ही पूरा रह गया।

कहना था बहुत कुछ उनके सामने
लेकिन समय ने क्या दिन दिखाया,
सब कुछ कह देने पर भी कुछ नही
मानो गाकर भी मैं बेसुरा रह गया।

जब हमने प्यार किया, निः स्वार्थ किया
क्या दिन, क्या रात, क्या आगे, क्या पीछे,
फिर से सब कुछ समेटा तो पाया
प्यार कहाँ वो तो पुरा ही अधुरा रह गया।

शायद वो उन पलों को भूल चुके है
जो हमने उनके साथ बिताये थे,
उनका शर्माना, सिमटना, गले से लगना
प्यार शब्द का पहला अक्षर ही अधूरा रह गया..

दर्द

भूलना चाह पर भूल न पाये
अपनी यादों से उनको छोड़ न सकें,
सारे सपने टूटकर बिखर गए
जब हम उनको पा न सकें।

कैसे भूल सकता हूँ उन पलों को
सबसे अनमोल, सबसे हसीं,
सब उन यादों क सहारे रोते है, जीते है
जब वो हमारी ज़िन्दगी में आ न सके।

हर वक्त लगता है क्या कमी थी
क्या हमारा प्यार इतना कमजोर था,
टूट गया सिर्फ़ एक झोंके से
वो चले गए और हम बुला न सके।

न जाने किसकी नजर लगी हमें
सब कुछ बिखर गया एक पल में,
हर रात उनको तीन गीत सुनने थे
लेकिन विडंबना हम एक भी गा न सके।

हे इश्वर तू भी क्या- क्या दिखाता है
कभी मिलाता है तो कभी जुदाई देता है,
क्या हमने कोई गलती की थी?
जिसका कर्ज आज भी चुका न सके..

दास्ताँ

क्यूँ करते हो इन्तजार किसी का
सारी दुनिया पड़ी है जीने को,
क्यूँ मरते हो हर लम्हा- हर पल
विष ही क्यूँ, अमृत भी है पीने को।

प्यार तो कर लिया निभाया भी
कुछ वक्त के बाद रंग फीका पड़ गया,
जब ख़ुद को देखा तो कुछ न था वहाँ
जहाँ सारा संसार पड़ा था जीने को।

क्या करूँ- क्या कहूँ, कुछ भी समझ नही
क्या मरुँ- क्या जीयूं, सब एक जैसा,
बहुत पीछे छोड़ आया अपने आप को
अब बाकी है तो सिर्फ़ दर्द सीने को।

जब वो हमारे ख्यालों में आते थे
दिल क तार ख़ुद बज जाते थे,
लेकिन अब वो आते है, जाते है
कुछ नही होता
कोई भी तमन्ना न बची अब मिलने को..

तुम्हारी कमी सी है

आज अकेले हम रहते है
जीते है, मरते है, क्या क्या करते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.

नजरें चारो दिशाओं में घूम
वापस एक जगह पर आकर टिकती है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.

जब हम अकेले होते है
यह सोचकर वक्त गुजार देते है,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.

हर सुबह लगता है की
वो हमारे लिए बनी है, आएगी,
बस इस बात का गम है
तुम्हारी कमी सी है.

उस प्यार का क्या मतलब
जिसका कोई भी वजूद न हो,
बस इस बात का गम है
आज भी- तुम्हारी कमी सी है..

उस वक्त

जब प्यार हुआ, इकरार हुआ
बात बढ़ी, जुदाई घटी, लम्हा कटा
उस वक्त- हम साथ साथ थे.

जब समय का चक्का चला
प्यार और बढ़ा, चरण सीमा तक
उस वक्त- हम साथ साथ थे।

जब वक्त आया उनकी कमी का
बेखुदी बढ़ी, दूरियां बढ़ी,
उस वक्त- हम साथ साथ न थे।

जब टूटने लगे, जान जाने लगी
लगता था क्या है उनके बिना
उस वक्तहम साथ साथ न थे।

जब वक्त आएगा, उनको जरुरत होगी
तड़प होगी प्यार होगा
उस वक्त- शायद हम न होंगे।

जब वक्त आएगा, वो अपने आप को
संसार में अकेला महसूस करेंगे
उस वक्त- शायद हम न होंगे..

Tuesday, May 5, 2009

प्यार में

कभी तो कोई प्यार कर जाता,
शायद हम भी प्यासे है प्यार के,
न जाने कब वो लम्हा आएगा,
बैठे वक्त काट लेते इन्तजार के.

सब आते है हँसाते है, रुलाते है,
समझते है, समझाते है, मनाते है,
पर कोई ये समझने को तैयार नही,
शायद हम भी प्यासे है दीदार के.

कभी-कभी लगता है जैसे की,
उसके बिना दुनिया में कुछ भी नही,
क्या करें समझ नही आता,
क्यूँ समेटते है लम्हे इनकार के.

कभी-कभी लगता है जैसे की,
सब कुछ भूल जाऊं, क्या शुरू, क्या अंत,
फिर अचानक ख़याल आता है,
क्या बुराई है एक तरफा प्यार में.

सब जानते है कशिश है प्यार में,
मिलना, बिछड़ना , हसना, रोना,
पागलपन, बेखुदी , दर्द, मर्म सब कुछ,
पर क्या करें कम्बखत हम भी है प्यार में..