हकीकत का साया यूँ साथ हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला
जमानत पर लिए कुछ दिन चाह की सुधार लूँ
पर हिम्मत न थी की दोबारा फिर उधार लूँ,
फिर वही कगार वही समय हो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
अतीत की परत को वर्तमान से ढकना चाहा
अतीत ने फिर वर्तमान में महकना चाहा,
हर कर्म को अश्क धीरे धीरे धो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
वक्त ने फिर एक बार अपना रुख मोडा
सामने देख किस्मत ने भी अपना मुख मोडा,
खोकर जो कुछ पाया उसे फिर खो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
न जाने क्यों परछाई पीछा नही छोड़ती
बुरी किस्मत भी अपना दम क्यों नही तोड़ती,
खुली आंखों से अब पूरी रात मैं सो चला
अपने को तो ठीक अपनों को भी खो चला।
एकबार फिर अतीत को सामने देख
पुराणी यादों के संग हो चला, न जाने क्यों..
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dhanyawaad...
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