आपकी जिस किसी पे नजर हो गई
जिंदगी उसकी मुनव्वर हो गई है.
मेरी हर राह हर मुकाम हो तुम
और मंजिल तेरा घर हो गई है।
ज़ख्म भरते नही दर्द जाता नही
चोट दिल पे इस कदर हो गई है।
जबसे तुमको मैंने तनहा देखा है
मेरी हालत और बदतर हो गई है।
कह नही सकता यूँ हाल-ऐ-दिल तुमसे
और चर्चा शहर भर हो गई है।
दूर कर ले तू मुझको ख़ुद से साथी
तेरी यादें मेरी हमसफ़र हो गई है..
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

bahot hi achi poem hai hame chu gai.....
ReplyDeletethnx
ReplyDelete