मुद्दत से जिसके वास्ते दिल बेक़रार था,
वो लौट कर न आये मगर इन्तजार था,
वो हमसफ़र था छोड़ गया राह में मुझे,
मैं फँस गया भंवर में वो दरिया के पार था,
मंजिल करीब आई तो तुम दूर हो गए,
इतना तो तुम बताओ कि ये कैसा प्यार था,
दीवार बना दी ये किसने दोनों के दरमियान,
न वो सुकून से बैठा न मुझको करार था,
ये बात उम्र भर समझ न पाया मैं,
क्यों दिल मेरा उस बेवफा का तलबगार था...
खालीद..
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