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Saturday, January 30, 2010

कश्मकश

बहुत दिनों के बाद,
आज
कुछ उम्मीद सी जगी है
मन व्याकुल सा है,
सासें धीरे-धीरे हवा में
अपना अस्तित्व घोल रही है,
आँखों में धुन्धरी सी चमक
लगता है कि
कोहरे में हलकी सी धुप
निकल आई हो
शरीर ठंडा पड़ गया है
मगर
आत्मा अभी भी
गर्म होने कि
आस दिलाये बैठी है।
क्या कोई बताएगा
कि
जिन्दगी एक ही पल में
इतने सारे मकाम क्यों लाती है?
या आज फिर से
अपनी उम्मीदों को
टूटता देखना पड़ेगा...

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